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साँई कम्प्यूटर टायपिंग इंस्टीट्यूट गुलाबरा छिन्दवाड़ा (म0प्र0) संचालक:- लकी श्रीवात्री मो0नां. 9098909565
created Jan 23rd, 05:44 by lucky shrivatri
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तमिलनाडु के मदुर्रे की 19 वर्षीय युवती कलैयारसी की मौत ने एक बार फिर समाज को झकझोर कर रख दिया है। स्लिम होने की चाह में उसने यूटयूब पर देखी गई एक दवा का सेवन किया, जो जानलेवा साबित हुई। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस खतरनाक प्रवृत्ति की चेतावनी है, जिसमें युवा पीढ़ी बिना जांच परख सोशल मीडिया की सलाह पर आंख मूंदकर भरोसा कर रही है। आज सोशल केवल मनोरंजन या संवाद का माध्यम नहीं रह गया है। यह स्वास्थ्य, सौदर्य, फिटनेस, निवेश और यहां तक कि मानसिक समस्याओं के समाधान का तथाकथित मंच बन चुका है। कुछ मिनटों की वीडियों या आकर्षक रील में 100 फीसदी रिजल्ट का दावा किया जाता हैं, ओर युवा वर्ग उसे सच मान लेता है। कलैयारसी का मामला इसी अंधविश्वास ओर जल्दबाजी का दर्दनाक परिणाम है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि सोशल मीडिया पर सामग्री डालने वाले व्यक्ति एक्सपर्ट, न्यूट्रिशनिस्ट या आयुर्वेदाचार्य घोषित कर देता है। दवाओं, सप्लीमेट्स ओर घरेलू नुस्खों को चमत्कारी बताकर प्रचारित किया जाता है, जबकि उनके दुष्प्रभाव, वैज्ञानिक प्रमाण और व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थितियों की कोई चर्चा नहीं होती। ऐसे में एक गलत सलाह सीधे जीवन में भारी पड़ सकती है। वहीं युवा भी स्लिम, फिट और परफेक्ट दिखने की सामाजिक होड़ में त्वरित समाधान चाहते है। मेहनत समय और चिकित्सकीय सलाह की जगह शॉर्टकट को चुना जाता है। सोशल मीडिया इसी कमजोरी का फायदा उठाता है। इस पूरे परिदृश्य में सोशल मीडिया के नियमन की कमी भी एक बड़ा कारण है। सोशल प्लेटफॉर्म पर स्वास्थ्य संबंधी सामग्री की कोई सख्त निगरानी नहीं है। भ्रामक विज्ञापन, अप्रमाणित दवाएं और झूठे दावे खुलेआम प्रसारित होते है। जब कोई हादसा होता है, तब जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है। न कंटेंट क्रिएटर पर सीधी जवाबदेही होती है न प्लेटफॉम पर ठोस कार्रवाई। हालांकि इसके लिए हम खुद भी जिम्मेदार है। किसी भी दवा या उपचार से पहले डॉक्टर से परामर्श अनिवार्य होना चाहिए।
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